बुधवार, 11 दिसंबर 2013

केजरीवाल फैक्टर का दूसरा पहलू भी है

-मृत्युंजय कुमार
द‌िल्ली का चुनाव पर‌िणाम कांग्रेस के ख‌िलाफ जनता का व‌िभाज‌ित मत है और इसमें भाजपा के बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद केजरीवाल और आप की उपस्थ‌ित‌ि चौंका रही है। इसका ‌देश के सभी दल और बुद्ध‌िजीवी ‌आपमुग्ध होकर व‌िश्लेषण करने में लगे हैं। इसमें कई महत्वपूर्ण ब‌िंदु पीछे छूट रहे हैं या ‌फ‌िर जान बूझकर पीछे छोड़े जा रहे हैं। आप को सफलता क्यों म‌िली? क‌ितनी म‌िली और अब आगे क्या होगा? यही सवाल हैं ज‌िस पर टीवीछाप बुद्ध‌िजीवी और पत्रकार कुकुहार मचाए हुए हैं। धारा के व‌िपरीत देखने की ह‌िम्मत करें तो कुछ और भी द‌िखता है।

सच है क‌ि अरव‌िंद केजरीवाल इस चुनाव पर‌िणाम से पारंपर‌िक राजनी‌ति करनेवाले दलों में सुधार के ल‌िए दबाव फैक्टर के रूप में काम रहे हैं पर ये भी सच है क‌ि वे राजनीत‌ि का कोई अद्भुत आदर्श नहीं कायम कर रहे। न तो व‌ैचार‌िक रूप से और न ही व्यावहार‌िक रूप से। वे महज द‌िल्ली में मौजूद व‌िकल्पों औ्रर वैचार‌िक खालीपन से म‌िले अवसर की उपज हैं। ब‌ल्क‌ि वे इस अवसर का पूरा उपयोग भी नहीं कर सके, अन्यथा भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में नहीं उभरती।

‌व‌िचारधारा के तौर पर वह कहीं स्टैंड लेते नहीं द‌िखते। उनका घोषणापत्र कहीं भी दूरगामी नहीं द‌िखता। उनकी सोच ब‌िजली पानी और तात्काल‌िक राहत वाले लोकलुभावन मुद्दों से आगे नहीं जाती द‌िखती। इनके नेता और कार्यकर्ता वैचार‌िक रूप से प्रश‌िक्ष‌ित भी नहीं है, ज‌िससे भव‌िष्य में उनके व‌िचलन की आशंका भी अध‌िक है। वामदलों के एजेंडे उनसे कहीं दूरगामी और जनोन्मुखी द‌िखते हैं और कई राज्यों में उसका असर भी द‌िखा है।

व्यावहार‌िक तौर पर भी केजरीवाल और उनके साथी अभी तक त्याग की कोई बड़ी छव‌ि नहीं प्रस्तुत कर सके हैं। भले ही उन्होंने इनकम टैक्स की नौकरी छोड़ी हो पर जीवनचर्या अभी भी उच्च मध्यवर्गीय ही है। इनके प्रत‌िन‌िध‌ि प्रेम के हाईपेड कव‌ि हैं, ब‌िजनेस क्लास से कम में सफर नहीं करते और होटलों में सुइट से कम में नहीं रुकते और अपने अलावा सभी बेइमान और बुद्दू समझतेहैं। इसकी तुलना आप वामदलों से नहीं कर सकते, ज‌िनके जन प्रत‌िनिध‌ियों को म‌िलने वाला वेतन भी संगठन ले लेता था और उन्हें खर्चे के ल‌िए पैसा म‌िलता था। द‌िल्ली में हमने खुद कई वाम सांसदों के आवास को देखा था, जहां सांसद के एक कक्ष को छोड़कर पूरे घर में कार्यकर्ताओं का कब्जा होता था। कई बार सांसद रहे रामावतार शास्त्री जैसे नेता फर‌ियादी की साइक‌िल पर बैठकर पैरवी करने जाते थे। न तो इनकी तुलना दक्ष‌िणपंथी संघ के पूर्णकाल‌िक पदाध‌िकार‌ियों से की जा सकती है जो व‌िचारधारा के ‌ल‌िए जीवन समर्प‌ित करते हुए ब‌िना पद की लालसा के चुपचाप काम करते रहते हैं। इनकी तुलना सरल-सहज अन्ना से भी नहीं की जा सकती जो खाने की एक प्लेट और पहनने के दो जोड़ी कपड़े के आधार पर ही व्यवस्था को बदलने का संघर्ष कर रहे हैं।

द‌िल्ली में ब्रांड केजरीवाल की सफलता के कारणों पर नजर डालें। केजरीवाल ने वही एप्रोच अपनाई जो धुर वाम और समाजवादी अपनाते थे। ताकतवर के ख‌िलाफ मुखर होना, डोर टू डोर का नेटवर्क बनाना। इसे आप जार्ज फर्नांडीस जैसे नेता में पहले देख सकते हैं। द‌िल्ली में इसी मुखर वाम और समाजवादी आधार का खत्म होना या कमजोर पड़ना केजरीवाल और आप को जगह दे गया। यह भाजपा से ज्यादा वामपंथी संगठनों के ल‌िए खतरे की घंटी है। इसका यह भी मतलब है क‌ि जहां ये धाराएं अभी भी मजबूत हैं वहां केजरीवाल प्रभाव नहीं डाल पाएंगे। दूसरा कारण मीड‌िया नेटवर्क‌िंग होना। केजरीवाल की टीम में मीड‌ियाकर्म‌ियों की भरमार है। मनीष स‌िसौद‌िया, शाज‌िया, व‌िधायक राखी ब‌िड़ला, जागरण के पूर्व पत्रकार च‌िदंबरम पर जूता फेंकनेवाले जनरैल स‌िंह आद‌ि। परदे के आगे, परदे की पीछे सक्र‌िय इस टीम के कारण कई बार इलेक्ट्रान‌िक मीड‌िया कई बार हद पार करते हुए आप के ल‌िए माहौल बनाते द‌िखी। यह पक्षपात यहां तक द‌िखता था क‌ि केजरीवाल के साथ‌ियों पर सवाल उठानेवालों को एंकर और व‌िश्लेषक डांटने लगते थे और केजरीवाल के कुमार व‌िश्वास और संजय स‌िंह जैसे प्रत‌िन‌िध‌ि उदंड की तरह शोर मचाने लगते।

सरकार न बनाने से पीछे हटकर ये जनता से बेइमानी भी कर रहे। भाजपा को कोई समर्थन देने को तैयार नहीं है, इसल‌िए उसका पीछे हटना स्वाभाव‌िक है। पर कांग्रेस के खुले प्रस्ताव के बावजूद सरकार बनाने से पीछे हटना बताता है क‌ि इनके ल‌िए जनता से क‌िए वादे बढ़कर राजनीत‌िक महत्वाकांक्षा है। इनकी महत्वाकांक्षा द‌िल्ली से बढकर देश तक पहुंच गई है, ज‌िसके कारण अपने वोटरों की आकांक्षाओं की ये हत्या करने में जुटे हैं। कही एेसा न हो दुबारा चुनाव इन्हें और पीछे न खड़ा कर दे। पहले रामव‌िलास पासवान ब‌िहार में एेसा जोख‌िम लेकर २९ व‌िधायकों से १० पर चले गए थे। भाजपा, आप और कांग्रेस को म‌िले मतों में ज्यादा अंतर नहीं है। पहले क‌िसी को आप से एेसे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं थी। इस बार व‌िरोधी आप की ताकत से वाक‌िफ हैं, इसल‌िए रणनीत‌ि उस ह‌िसाब से बनाएंगे तो शायद ये और पीछे भी जा सकते हैं। फ‌िर देश की महत्वाकांक्षा का क्या होगा? साथ चुनाव में ये द‌िल्ली बचाएंगे या देश में जाएंगे? ये स्थ‌ित‌ि भाजपा के ज्यादा अनुकूल होगी।

आप की उपल‌ब्ध‌ियों में ग‌िनाई जा रही है क‌ि इसने चुनाव में जात‌ि को तोड़ा है। पहले भी द‌िल्ली में जात‌ि का फैक्टर मजबूत नहीं रहा है, अलग अलग ह‌िस्सों से आए लोग ब‌िजली पानी जैसी रोजमर्रा कीसमस्याओं से जूझते रहे हैं। द‌िल्ली के ज‌िन क्षेत्रों में जात‌ि धर्म के आधार पर ‌ट‌िकट बंटते रहे हैं, वहां आप ने भी उसी आधार पर ट‌िकट द‌िए थे। स‌िख बहुल इलाकों से स‌िख को, मुसल‌िम बहुल इलाकों में मुसल‌िम को और जाट बहुल इलाकों में जाट को ट‌िकट द‌िए। ये उपल‌ब्ध‌ि भी बताई जा रही है क‌ि झाडू की हवा में एेसे लोग भी जीत गए ज‌िन्हें कोई नहीं जानता था। यह पहली बार नहीं हुआ है। क्षेत्रीय दलों के उभार में एेसा अक्सर होता है। ब‌िहार में जब लालू यादव का उभार हुआ तो सड़क पर पत्थर तोड़नेवाली मजदूर भगवती देवी भी व‌िधायक बन गई थी। आज चाय बेचनेवाले मोदी भी प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार हैं। यही इस लोकतंत्र की खास‌ियत भी है।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

लाल मूंगे के देश में-एक


























एक दिसंबर २०११ की दोपहर चाइना एयरलाइंस की फ्लाइट से जब ताइवान के लिए चला तो वहां के बारे में कोई खास अंदाजा नहीं था। थोड़ी देर की हिचकिचाहट के बाद सहयात्री से परिचय हुआ तो पता चला कि वह हमारी टीम से है। सहयात्री दीप्ति मुंबई में ट्रैवल कंपनी काक्स एं‌ ड किंग्स में सीनियर एक्जीक्यूटिव थी। उसी की मदद से ३५००० फुट की उंचाई से समंदर में तैरते फेन जैसे बादलों की एक तस्वीर ली। ताइवान की राजधानी ताइपेई पहुंचने में छह घंटे लगे। जब पहुंचे तो वहां रात के दस बज चुके थे। कस्टम चेकिंग के दौरान दल के अन्य सदस्यों से परिचय हुआ। मेरे समेत कुल आठ लोग। इसमें से छह ट्रेवल कंपनीज के प्रतिनिधि और दो जर्नलिस्ट। अपना बै ग कलेक्ट करने के बाद बाहर लाबी में ताइवान टूरिज्म ब्यूरो की सिंगापुर आफिस की अधिकारी वेन चेरा और गाइड जैक्सन हू इंतजार कर रहे थे। गर्मजोशी से स्वागत के बाद मैं ताइवानी करंसी के जुगाड़ में लगा। मेरे पास भारतीय मुद्रा थी और मास्टर कार्ड था। एयरपोर्ट पर एक्सचेंज काउंटर पर भारतीय मुद्रा एक्सचेंज की सुविधा नहीं थी। मेल टुडे के पत्रकार रोहन के पास भी पौंड था। फिर वहां के एटीएम को ट्राइ किया गया, वहां किसी का कार्ड नहीं चला। फिर निराश टीम के पास लौटे। एयरपोर्ट से निकलते निकलते ११ बज गए थे। टेंपरेचर १८ के करीब था। बस में गाइड जैक्सन ने बताया कि होटल में खाना नहीं मिलेगा। रास्ते में ही कुछ पैक करा लें। मेरे साथ वेज का चक्कर था। मैकडोनाल्ड में कुछ भी वेज नहीं मिला। हम चार लोगों को लेकर गाइड दूसरे स्टोर में गए। वहां भी प्योर वेज के नाम पर पोटैटो फिंगर और चिप्स मिला। हमारे और रोहन के पास ताइवानी पैसे थे नहीं तो पेमेंट यूएस डालर में दीप्ति ने किया। साढ़े ११ बजे होटल हावर्ड पहुंचे। रिशेप्सन पर कमरे का इंट्री कार्ड लेने और सुबह आठ बजे मिलने के वादे के साथ विदा हुए। कमरा अच्छा था। भूख लग चुकी थी। कमरे में प्लेट में सेब (एप्पल) रखा था। पोटैटो फिंगर और सेब के साथ भूख मिटाई और सो गए। सुबह सात बजे ही नहा धोकर पैकिंग कर तैयार हो गए। रोहन के साथ सेकेंड फ्लोर पर ब्रेकफास्ट के लिए पहुंचा। पहले से काफी भीड़ थी। पता चला कि ताइवान में छह बजे से ब्रेकफास्ट का समय शुरू हो जाता है। वेज ढूंढने में समय लगा। हमारे साथवाले वेजीटेरियन अंडा लेते थे। उन्हें खास दिक्कत नहीं हुई। पर मैंने सुरक्षित तरीका अपनाते हुए फ्रूट जूस और ब्रेड बटर से काम चलाया। बाकी साथी आए तब तक हम चेक आउट कर आए। होटल में शानदार इंटीरियर के साथ कुछ तस्वीरे खींची। यहां से हमें ताइवान के दूसरे सबसे बड़े शहर काउशिओंग हाइस्पीड ट्रेन से जाना था।

रविवार, 21 जून 2009

साक्षी - माय डॉटर




सोमवार, 18 अगस्त 2008

अखिल तो हारे पर मोनिका को किसने हराया



मुक्केबाजी में अखिल हार गए और एक पदक की उम्मीद टूट गयी पर एक उम्मीद अपने देश में ही तोड़ दी गयी थी वेटलिफ्टर मोनिका से भी पदक की उम्मीदें थीं लेकिन खेल संघों की गन्दी राजनीती ने उसे चीन जाने ही नहीं दिया
सवाल है कि कौन है मोनिका का दोषी?
क्या वो सिर्फ़ मोनिका का ही दोषी है या पूरे देश का?
मोनिका हंगामे के बाद निर्दोष साबित हुई पर दोषी को क्या सजा मिलेगी?

मोनिका
मणिपुर पहुँची तो उसका नायकों की तरह स्वागत हुआ पीडा के चरम से गुज़री मोनिका की रुलाई फूट पड़ी फ़िर एक सवाल कि उसके आंसू कौन पोछेगा?

गुरुवार, 12 जून 2008

बिहारी मजदूरों के आगे गिड़गिड़ाए पंजाबी किसान



पंजाब में पूरबिए-१

बिहार के विकास और पंजाब की खेती में या संबंध है? यह सवाल बेमानी नहीं है। अभी पंजाब के किसान अपनी खेती को लेकर चिंतित हैं। कारण है बिहार में चल रहे विकास कार्य। बिहार में निर्माण कार्यो के कारण बेरोजगारों को लगातार काम मिल रहा है। उसकी वजह से वे मजदूर जो पंजाब का रूख करते थे इस बार बिहार आने पर नहीं लौटे। इससे पंजाब में धान की रोपाई के लिए मजदूरों का संकट हो गया। कई अखबारों ने एक फोटो छापी कि जालंधर रेलवे स्टेशन पर एक संपन्न किसान विपन्न से दिख रहे मजदूर को हाथ जोड़कर रोक रहा है। हाथ जोड़ने का कारण है कि यहां की खेती और इंडस्ट्री बिहारऱ्यूपी के मजदूरों पर निर्भर है। आतंकवाद के समय में भी जब स्थानीय लोग खेतों पर नहीं जाते थे या पलायन कर गए थे तब भी इन्हीं मजदूरों ने यहां की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। हरित क्रांति की नींव बिहार यूपी के मजदूरों की मेहनत पर ही रखी गई। उस दौरान बिहार यूपी के काफी मजदूर आतंकियों की गोलियोंं के शिकार बने लेकिन इसके बदले उन्हें कोई महत्व नहीं मिला। पुलिस ने भी उनकी हत्याआें को अपने रिकार्ड में दर्ज नहीं किया। कोई सामाजिक संस्था या व्यि त भी नहीं दिखता जो पंजाब में पूरबियों की स्थिति पर जमीनी तौर पर काम कर रहा हो। यहां के विकास में इस योगदान के बावजूद पंजाब में बिहारऱ्यूपी के लोगों को भैय्ये कहा जाता है। ये बड़े भाई के समान आदर भाव वाला शब्द नहीं है। इसे वे गाली के सेंस में प्रयोग करते हैं। उ्न्हें भैय्यों की जरूरत है, वे उस पर भरोसा भी करते हैं पर यह बर्दाश्त नहीं करते कि वह मजदूर के स्तर से उपर का जीवन जीए।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

क्यों नहीं खेलेगी सानिया?


भारत की टेनिस सनसनी कही जानेवाली सानिया मिर्जा ने भारत में नहीं खेलने का ऐलान कर उन लोगों के मुंह पर तमाचा मारा है जो उसे बेमतलब के विवादों में घसीटकर अपनी दुकानदारी चला रहे थे।
ये वही लोग हैं जिनकी अपनी कोई खास पहचान नहीं। उन्हें सानिया की तंग ड्रेस से कोई मतलब नहीं, उन्हें तिरंगे के मान की भी चिंता नहीं। वे तो बस सानिया की पहचान पर कीचड़ उछालकर अपनी पहचान बनाना चाहते थे। अगर ऐसा नहीं होता तो सानिया की बजाय अपने घर और आसपास के लोगोंं पर अपने सड़े विचार लागू करते। लेकिन इस स्थिति मेंं उन्हें कोई पब्लिसिटी नहीं मिलती। सानिया के यहां नहीं खेलने से भी इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। योंकि ये लोग टेनिस के भी प्रेमी नहीं हैं योंकि उन्हें टेनिस की गेंद नहीं सानिया की टांगें दिखती हैं। फर्क उन्हें पड़ता है जो सानिया में एक राष्ट्रीय गर्व का अहसास करते हैं। उसकी हर झन्नाटेदार शाट और जीत पर जिनका सीना फूल जाता है। देश में बढ़ती गरीबी और अधिकतर मोर्चे पर पराजय के बीच जीत के जज्बे को सेलीब्रेट करते हैं। जो धर्म, मजहब और राजनीति से आगे बढ़कर हुनर को सलाम करते हैं, उन्हें सानिया के अपनी जमीन पर नहीं खेलने फर्क पड़ता है। फिर आप ही बताइए कि सानिया को इन लोगों के लिए योंं नहीं खेलना चाहिए?
दुखी सानिया ने कहा है कि वे किसी और विवाद से बचने के लिए बंगलुरू ओपन स्पर्धा से ही दूर रहेंगी। उन्होंने कहा कि मेरे मैनेजर ने मुझे भारत में नहीं खेलने की सलाह दी है। सानिया ने अफसोस जताया कि वे जब-जब भारत में खेली हैं, उन्हें किसी न किसी परेशानी का सामना करना पड़ा। इसलिए इस बार हमने न खेलना ही ठीक समझा। कभी कट्टरपंथियों ने टेनिस कोर्ट पर पहने जाने वाली पोशाक पर आपत्ति जताई तो हाल ही उन पर पिछले दिसंबर में हॉपमैन कप के दौरान राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान करने का आरोप लगा और उनके खिलाफ देश की कुछ अदालतों में मुकदमे भी दायर किए गए। कोर्ट से बाहर के इन बवालों से सानिया इतनी दुखी थीं कि एक बार तो उन्होंने टेनिस को ही छोड़ने का इरादा कर लिया था।

सोमवार, 28 जनवरी 2008

कैसा महसूस होता है?


तुम कौन हो
तुम्हारी अहमियत क्या है
तुम्हारी खबर क्यों छापें
क्यों दिखाएं अपने चैनल पर
तुम्हारी बेटी की इज्जत
लुट गई तो क्या हुआ
गलती तुम्हारी ही है
क्यों रहते हो झुग्गी में
क्यों नहीं है उसमें मजबूत दरवाजा
दरवाजा नहीं होगा तो
कोई कोई घुस ही जाएगा
क्या तुम्हारे पास घटना की
कोई लाइव या स्टिल फोटो है
नहीं तो इसमें बिकने लायक क्या है
लोग इसे क्यों देखेंगे
उन्हें इस खबर में क्या थ्रिल मिलेगा
तुम्हारी बेटी की इज्जत तो लुट गई
पर बिना मसाले के खबर नहीं बनेगी
ही इस पर आएगा एसएमएस
जिससे होती है कमाई
बुरा मत मानना
आखिर टार्गेट रीडर या दर्शक
का भी खयाल रखना है
अगली बार जब भी कुछ
ऐसा हो तो प्लीज कैमरे की
व्यवस्था जरूर करना
नहीं तो हमें खबर कर देना
हमारे फोटोग्राफर पहुंच जाएंगे
तुम्हें भी मिलेगा इसका लाभ
पब्लिसिटी मिलेगी
हमारी खूबसूरत एंकर रिपोर्टर
पूछेगी तुम्हारी बेटी से सवाल
कैसे हुआ था बलात्कार
उस समय
तुम्हें कैसा महसूस हो रहा था?

मंगलवार, 8 जनवरी 2008

आखिर नस्लवादी कौन है?

भारतीय क्रिकेट टीम का आस्ट्रेलिया दौरा विवादों में घिर गया है। पहले तो अंपायरों ने पक्षपात का इतिहास रचा। फिर एकतरफा फैसला कर भारतीय खिलाड़ियों को नस्लवादी घोषित किया गया। आखिर हम यों करते हैं गोरों से न्याय की उम्मीद। यह इतिहास रहा है कि एशियाई टीमों के साथ उनका रवैया हमेशा से निंदाजनक रहा है। इनकी किसी भी सफलता को वे अहसान की तरह ही स्वीकार करते हैं। हर जीत को संदेह की निगाह से देखते हैं और उसे तु का मानते हैं। फिर हम योंं चाहते हैं उनसे अपने आचरण का सर्टिफिकेट? या आस्ट्रेलियाई टीम का यह रवैया नया है?
जाहिर है कि नहीं, पहले भी उसके खिलाड़ी प्रतिद्वंदी टीम को चोट पहुंचाने वाली टिप्पणियां करते रहे हैं। बल्कि इसे वे अपना सश त हथियार मानते हैं। क्रिकेट की भाषा में जिसे ..स्लेजिंग.. कहा जाता है दरअसल उस छींटाकशी को आस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों ने अपमानजनक रूप दे दिया था। कई जीतों का श्रेय गर्व से वे अपने इस व्यवहार को देते रहे हैं।
लगातार मिल रही जीत ने उनके उल्लास को कब गर्व में और गर्व को दर्प मेंं बदल दिया यह आस्ट्रेलियाई कैप्टनों के क्रमश: बयानों में साफ देखा जा सकता है। जीत की लिप्सा अब कुंठा बन चुकी है। इसलिए हार की आशंका उन्हें बौखला देती है। दरअसल आस्ट्रेलियाई जीत और हार दोनों को ठीक ढंग से पचा नहीं पा रहे। एक मैच के समापन समारोह के दौरान पोंटिंग ने बीसीसीआई के अध्यक्ष शरद पवार को मंच से ध का देकर हटा दिया था। अभी भारत दौरे पर जब श्रीसंत ने उन्हीं की स्टाईल में उन्हें जवाब दिया तो उन्हें बुरी तरह अखर गया और आस्ट्रेलिया दौरे पर बदला लेने का मन बना लिया था।
पहले अंपायर, फिर मैच रेफरी और उसके बाद आईसीसी का पक्षपात पूर्ण रवैये ने भारतीयों को आंदोलित कर दिया। आम तौर पर अंपायर अपनी तरफ से निष्पक्षता बरतते हैं। लेकिन सिडनी जो कुछ हुआ उससे उन पर उंगली उठनी ही थी, उठी। शायद वे आस्ट्रेलियाई टीम के हौव्वे के दबाव में आ गए। लेकिन इसके बाद मैच रेफरी ने जिस तरह से एकतरफा फैसला कर भज्जी को नस्लवादी ठहरा दिया और आईसीसी का रवैया भी उसकेसमर्थन में रहा। इससे साफ हो गया कि क्रिकेट में नस्लवाद है और गोरे देश इसके पोषक हैं। वे आज भी आसानी से इसे स्वीकार नहीं करते कि क्रिकेट में भारत की भी थोड़ी बहुत ताकत है। हालांकि यह ताकत भारत के विकास और दूसरे पहलुआें का प्रतिनिधि नहीं है।
भारत क्रिकेट दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और यही उसकी ताकत है। इसी ताकत के बूत जगमोहन डालमिया आईसीसी को अपने इशारे पर चलाया करते थे। इसी ताकत ने बीसीसीआई को आईसीसी के फैसले को चुनौती देने का माद्दा दिया है। इसलिए जरूरी है कि मामले को बीच में न छोड़ा जाए और भारत सिडनी टेस्ट रद करने के फैसले पर अड़ा रहे और दौरा छोड़कर वापस चला आए। बेशक इसके लिए आस्ट्रेलिया से क्रिकेट संबंधों को तिलांजलि देने की नौबत आ जाए। यही क्रिकेट के नस्लवाद को भारतीय जवाब हो सकता है।

सोमवार, 31 दिसंबर 2007

नव वर्ष की बधाई


साल नया
संकल्प नया
सुबह
नयी
उम्मीद
नयी
सृजन
नया
विश्वास
नया
नए
साल में
सभी
जनो के
हो
जीवन में
उल्लास नया

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

पाक में लोकतंत्र की या यही नियति है



...मेरे उम्मीदों का चमन खाक हुआआशियाना सजाया था, राख हुआ।... तमाम उठापटक के बाद भी पाकिस्तान की अवाम ने जो उम्मीदेंं संजोकर रखी थीं, वह बेनजीर की हत्या के साथ ही खत्म हो गइंर्। लोकतंत्र के विरोधी धमकियां तो दे रहे थे पर वे ऐसा कदम उठाने का दुस्साहस करेंगे, ऐसी आशंका नहीं थी। हालांकि यह बिलकुल अप्रत्याशित नहीं था। सत्ता से चिपकेजनरल मुशर्रफ से समझौते की चर्चाआें के बीच जब बेनजीर पाकिस्तान वापस लौटी थीं, उस समय भी उनका ऐसा ही धमाकेदार स्वागत हुआ था। उस खूनी स्वागत में कइयों की जान गई पर खुदा के शुक्र से बेनजीर बच गई थी और उन्होंने अपना लोकतांत्रिक अभियान जारी रखा था। पर इस बार आतंकियों का निशाना खाली नहीं गया। जाहिर है तानाशाही से मुि त की आस लगाए पाकिस्तान की जनता के लिए यह भारी झटका है। योंकि बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की जनता के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मजबूत प्रतीक थी और इसलिए उनकी हत्या लोकतंत्र की हत्या है। सवाल उठता है कि अब या होगा? या पाकिस्तान में लोकतंत्र लौटेगा? अगर लौटेगा तो कैसे और किसके लिए? या यह संयोग ही है कि बेनजीर के पिता भी लोकतंत्र के नाम पर फांसी चढ़ चुके हैं? या पाकिस्तान में लोकतंत्र की यही नियति है? जवाब के लिए पाकिस्तान के हालात का जायजा लेना पड़ेगा।
जनरल परवेज मुशर्रफ पहले तो वर्दी को दूसरी चमड़ी बता रहे थे। जब अतंरराष्ट्रीय दबाव में उन्हें लोकतंत्र लागू करने के लिए कदम उठाने पर मजबूर किया जाने लगा तो उन्होंने जबरन राष्ट्रपति पद हथिया लिया और वर्दी उतारने की घोषणा कर दी। दूरगामी फायदों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सेना की कमान कियानी को थमा दी। चुनाव में नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो दोनो ही उन्हें आड़े हाथों ले रहे थे। दोनो के ही नामांकन भी खारिज कर दिए गए थे। जाहिर है कि मुशर्रफ लोकतंत्र की कमान किसी भी उस व्यि त के हाथ में नहीं जाने देना चाहते थे जिसका कोई कद हो। नवाज और बेनजीर दोनो ही चुनाव के बाद मुशर्रफ को दंडित करने की बात करने लगे थे। दोनों नेताआें की सभाआें में जुट रही भीड़ उनके जन समर्थन को साबित करने के लिए पर्याप्त थी। उधर मुशर्रफ का विरोध बढ़ ही रहा था। मुशर्रफ के मुकाबले के लिए दोनों नेताआें ने हाथ भी मिला लिए थे और पाकिस्तान में इन दोनों से बड़ी जम्हूरियत की कोई ताकत नहीं है। इन दोनों का साथ आना मुशर्रफ के लिए खतरेकी घंटी थी। इसीलिए पहले नवाज शरीफ पर जब हमला हुआ और वह बाल बाल बच गए, फिर कुछ ही देर बाद बेनजीर पर हमला हुआ तब लोगों की उंगलियां सीधे मुशर्रफ पर उठ गईं। अगर नवाज भी मारे जाते तो पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए आवाज उठानेवाला कोई दमदार शख्स कई सालों तक नजर नहीं आता। पंजाब के लुधियाना में मुसलमानों ने तो बेनजीर की हत्या की खबर आते ही मुशर्रफ को दोषी ठहरा दिया और पुतला फूंकने की घोषणा कर दी। अब मुशर्रफ अपने दामन पर लगे इस दाग को धोने में शायद कभी सफल नहीं हो पाएं। घटना भी उन्हीं केशहर रावलपिंडी में हुई। सुरक्षा इंतजाम का जिम्मा भी उन्हीं की सरकार के उपर था। पाकिस्तान में लोकतंत्र से सबसे ज्यादा डर भी उन्हीं को दिख रहा था। इसलिए दुनिया भर के सवालों का जवाब भी उन्हीं को देना होगा।
दुनिया के सवालों से तो बाद में निपटना होगा। पहले पाकिस्तान की जनता ही जवाब मांगेगी। अभी की स्थिति में वहां गृहयुद्ध के हालात हो जाएंगे। बेनजीर की हत्या की खबर फैलते ही जिस तरह से लोग सड़कोंं पर उतरने लगे और आगजनी की खबरें सामने आ रही हैं। इससे भी संकेत साफ हैं। इस हालात का सबसे ज्यादा फायदा आतंकी संगठन उठाएंगे। पाकिस्तान में अराजकता की स्थिति उनके लिए सर्वाधिक मुफीद होगी। वे अपना दायरा अफगानिस्तान से सटे कबायली इलाकों से बढ़ाकर मध्य पाकिस्तान तक फैलाने की कोशिश करेंगे और यह पाकिस्तान की जम्हूरियत के लिए खतरनाक साबित होगी ही मुशर्रफ के लिए खतरनाक स्थिति होगी। योंकि एक तरफ उन्हंे नापसंद करने वाले आतंकी संगठन अपनी ताकत बढ़ाकर उन्हें चुनौती देंगे। दूसरी तरफ आतंकियों से निपटने के नाम पर अमेरिका का हस्तक्षेप बढ़ेगा। अगर अलकायदा जैसे संगठन ने इस घटना को अंजाम दिया है तो फिर नवाज के बाद मुशर्रफ ही उसका अगला निशाना होंगे। पहले अमेरिकापरस्ती की नीति मुशर्रफ पर हमले का सबब बन चुकी है।
बेनजीर की ही तर्ज पर भारत में भी घटनाएं हो चुकी हैं। भारत के लोकप्रिय नेता राजीव गांधी भी चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी ही ताकतों का निशाना बनकर जान गंवा चुके हैं। इसलिए भारत को भी सतर्क रहना होगा। योंकि कोई शासक बने सीधे तौर पर भारत-पाक के रिश्ते पर कोई खास असर नहीं होगा लेकिन जब पाकिस्तान में कट्टरपंथियोंं का वर्चस्व बढ़ेगा तो भारत में आतंकवाद को शह मिलेगी। पाकिस्तान के कट्टरपंथी वैसे भी बेनजीर और नवाज के भारत समर्थक बयानों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते रहे हैं। दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते भी इस बीच ठीक ठाक हो गए थे। वाघा बार्डर और अटारी के जरिए आयात और निर्यात का सिलसिला बढ़ा था। चीन, ईरान और अफगानिस्तान का माल भी इसी रास्ते आने लगा था। ऐसी बड़ी घटना से इस रिश्ते को भी झटका लगेगा।
रही बात पाक में चुनाव प्रक्रिया की तो बेनजीर की मौत के बाद या इसे जारी रखा जाएगा ? यह सवाल है। इस घटना के बाद या बेनजीर के समर्थक और नवाज शरीफ अपनी आवाज जम्हूरियत के हक में पूरी ताकत से बुलंद कर पाएंगे। या इमरान खान जैसी शख्सियत इस स्थिति में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाएंगी। अगर चुनाव करा भी लिए गए तो उसके बाद बनी सरकार भय और आतंक के इस कोहरे से पाकिस्तान की जम्हूरियत को बाहर निकाल पाएगी। इन सवालोंं पर पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी।

रविवार, 23 दिसंबर 2007

पंजाब गुजरात भी नहीं


यह पंजाब है। गुरुओं की धरती । उन गुरुओं की िजन्होंने दूसरों की जान बचाने के िलए अपने शीश की कुर्बानी दी थी । यहां के रग-रग में वीरता और त्याग का इितहास भरा है । यहीं की धरती भगत िसंह और उधम िसंह जैसे वीरों को पैदा करती है । लेिकन आज िस्थित बदल गई है। आज यहां सच को सच कहने का कोई साहस नहीं िदखा पा रहा है। माने हुए आतंिकयों को सरेआम शहीद का दर्जा देकर मिहमामंिडत िकया गया और सरकार चुप है। वही सरकार जो संिवधान के प्रित आस्था और कर्तव्य की शपथ लेती है । सरकार की बैसाखी बने लोग भी चुप हैं। मामला पंजाब में आतंकवाद का नेतृत्व करनेवाले जनरैल िसंह िभंडरावाले की तसवीर का है । िभंडरावाले के उपर िसख युवकों की भावनाएं भडका कर उन्हें सैंकडों िनर्दोषों की हत्याओं के िलए प्रेिरत करने का आरोप है। िभंडरावाले पर पिवत्र स्वर्ण मंिदर के आतंकी कार्यों के िलए इस्तेमाल करने का आरोप भी है। उसे आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान स्वर्ण मंिदर पिरसर में ही मारा गया था । आतंकवाद पीिडत सैंकडो पिरवार उसे आतंकवाद के दौर का सबसे बड़ा खलनायक मानते हैं परंतु िशरोमिण गुरुद्वाारा प्रबंधक कमेटी उसे आतंकी नहीं शहीद मानती है। और इसी आधार पर उसकी तस्वीर स्वर्ण मंिदर पिरसर में िस्थत अजायब घर में लगा दी।
उस अजायब घर में िभंडरावाले ही नहीं इंिदरा गांधी और बेअंत िसंह और जनरल वैद्य के हत्या रे की तस्वीर भी लगी हुई है । ये तसवीरें खलनायक के तौर पर लगी होती तो कोई बात नहीं थी। िचंता की बात है िक इन आतंिकयों को िसख कौम के नायक और शहीद के तौर पर प्रस्तुत िकया गया । समाचार पत्रों में खबरें आईं। लेिकन मुख्यमंत्री प्रकाश िसंह बादल चुप रहे। आतंकवाद के िखलाफ बढ़चड़ कर बयानदेनेवाली भाजपा के नेता भी कहने लगे िक यह एसजीपीसी का आंतिरक मामला है। वे अपने संस्थान में िकसी का भी फोटो लगा सकते हैं। लेिकन क्या यह िसर्फ िवचार धारा और िनजता का मामला है । कांग्रेस इसका खुलकर िवरोध कर रही है क्योंिक इन आतंिकयों के सबसे ज्यादा िशकार उसी के नेता हुए थे। लेिकन भाजपा की चुप्पी िचंताजनक है? क्योंिक उसका वोटबैंक पंजाब के िहंदू हैं और वही सबसे ज्यादा इन आतंिकयों का िशकार बने थे। जािहर है िक इस िवरोध की िस्थित में उसे अकाली दल से अलग होने की िस्थित में आना पड़ता और उसके नेताओं को सत्ता सुख से वंिचत होना पड़ता । अकाली दल के नेताओं का रुख तो अितवाद की सीमा को लांघ गया। उसके विरष्ठ नेता बयान देकर उन लोगो को सीमा में रहने की नसीहत दे रहे थे िजन्होंने िभंडरावाले को आतंकी कहने की जुर्रत की।
क्या यह कदम उन लोगों के सीने में िफर से टीस नहीं भरती होगी िजनके अपने आतंकवािदयों के िशकार बने थे। यह सच है िक कुछ लोग िभंडरावाले और दूसरे आतंिकयों को नायक मानते हैं। उनका मानना है िक इन्होंने िसख कौम के िलए कुरबानी दी। कई िसखों से बातचीत में इसका अहसास भी होता है । इन्ही के समरथन के िलए एेसे कदम उठाए गए। लेिकन एेसे लोगों की संख्या िकतनी है? शायद बहुत कम । सबसे बड़ा सवाल यह है िक क्या सआम लोग भी इन आतंिकयों को शहीद मानेंगे। जािहर है िक कभी नहीं ।
दरअसल गिणत लोकसभा चुनाव का है। अकाली दल मालवा में मजबूत हो रहे कट्टरपंिथयों को अपनी ओर कर डेरा के असर को काटना चाहता है। उसे उम्मीद है िक िजतना िभंडरावाले की तस्वीर लगाने का िवरोध होगा उतना ही कट्टरपंथी िसखों के वोटों का ध्रुवीकरण उसकी ओर होगा जो िवधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर चले गए थे। भाजपा इस मुद्दे पर चुप्पी साधकर अपनी राजनीितक उम्मीद को बनाये रखना चाहती है परंतु शायद पिरणाम एेसे न हों । क्योंिक जनता सच जानती है और पंजाब गुजरात भी नहीं है।

रविवार, 16 दिसंबर 2007

ब्लागियाने का मजा

ब्लाग की दुनिया भी अजीब हैतमाम उतार-चढ़ाव, बंधनों के बावजूद इसके रास्ते इतने सपाट दिखते हैं कि मीलों दूर बैठा आदमी अपने असली चेहरे के साथ साफ साफ दिख ही जाता हैउतार चढ़ाव इसलिए क्योकि कुछ साथी तकनीकी लाभ लेते हुए अपनी पहचान को छिपाते हुए बेबाक बात रखते हैंशायद व्यावसायिक, सामाजिक मजबूरियां उन्हें अपनी पहचान छिपाने के लिए विवश कर देती हैंइसके बावजूद खास बात यह है कि व्यक्ति ब्लाग पर अपनी बात, अपने विचार जिस बेबाकी से रखता है उससे उसका सही चेहरा ही सामने आता हैतकनीकी नकाब भी किसी ब्लागिए को बहुत देर तक छिपाकर नहीं रख सकतीब्लागखोरी करते-करते मुझे भी कई पुराने दूर बैठे, प्रकट और छद्म नामों से विचरण करते पुराने परिचितों से टकराने का सौभाग्य मिलापरिचितों से मिलकर, उनके बारे में जानकर, उनकी खैर खबर पाकर अच्छा लगता हैमुझे भी लगाआपको भी अच्छा लगता होगाकुछ लोगों के लिए पुनर्मुलाकात कटु हो सकती है, बशर्ते पुराना अनुभव कड़वा रहा होवैसे ब्लागखोरी करते हुए आपको कोई ऐसा अनुभव हुआ हो बेबाक पर सभी से शेयर कर सकते हैंक्या पता ब्लाग की इन गलियों में फिर कोई परिचय की खिड़की खुल जाए

भाजपा के नए खेवनहार

मंगलवार, 11 दिसंबर 2007

गुजरात चुनाव-पहले ही हार की मुद्रा में कांग्रेस

लगता है कि कांग्रेस मान चुकी है कि गुजरात के महाभारत में मोदी की जीत होगी। पहले चरण के मतदान के दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान से तो ऐसा ही लगता है। मनमोहन सिंह ने कहा कि भाजपा लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार इसलिए घोषित कर रही है क्योंकि उसके नेताओं को डर है कि मोदी इस पर दावा पेश करेंगे। मनमोहन सिंह के इस बयान में ही मोदी की जीत के संकेत छिपे हैं। लेकिन कैसे? आएं इसे समझने की कोशिश करते हैं।
यह सभी जानते हैं कि गुजरात चुनाव मोदी के लिए राजनीतिक तौर पर जीवन मरण का प्रश्न बन चुका है। हारने पर भाजपा के विरोधी ही उन्हें रसातल में भेजने को तैयार होंगे। जीतने पर कम से कम गुजरात में उनका कद पार्टी से बड़ा हो जाएगा और तभी वह प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष पद के लिए दावा कर सकेंगे। मनमोहन अगर कह रहे हैं कि मोदी ऐसा करनेवाले थे और इसे रोकने के लिए आडवाणी के नाम की घोषणा की गई है तो इसका मतलब है कि वे मान रहे हैं कि मोदी सत्ता में वापस लौट रहे हैं। तो फिर क्या कांग्रेस गुजरात में हारी हुई लड़ाई लड़ रही है? जाहिर है कि जवाब हां होगा। कम से कम कांग्रेस नेतृत्व तो कम से कम यही मान रहा है। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी पर मौत का सौदागर कहकर हमला बोलनेवाली सोनिया गांधी चुनाव आयोग को भेजे जवाब में इससे पलट जाती हैं। अगर उन्हें जीत की उम्मीद होती तो कांग्रेस के नेता मतदान से पहले या तो चुनाव आयोग को जवाब नहीं भेजते या फिर अपनी बात पर अड़े रहते। लेकिन केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट ने कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष तसवीर साफ कर दी। अगर गुजरात में मोदी हार भी जाते हैं तो यह वैसा ही होगा जैसा कांग्रेस का केंद्र में बिना उम्मीद के सत्ता हाथ लगना। इसके पीछे बड़ी वजह कांग्रेस की कमजोर रणनीति भी रही है। गुजरात में जिस तरह से भाजपा ने नरेंद्र मोदी के कद को विस्तारित कर जनता के सामने रखने में कोई व्यवधान नहीं डाला उसका असर कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा। वे मोदी के कद के सामने कांग्रेस की ओर से किसी नेता को लोगों के सामने नहीं रख पाए। शंकर सिंह वाघेला या अन्य दूसरे गुजराती कांग्रेसी नेताओं में किसी को आगे करने की बजाय कांग्रेस के रणनीतिकार भाजपा के बागियों में अपनी पार्टी के लिए सत्ता में लौटने का अवसर तलाशते रहे। यही गुजरात में कांग्रेस की कमजोर कड़ी साबित हो रही है।

सोमवार, 10 दिसंबर 2007

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा
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यह इक्कीसवीं सदी है
इसलिए बदल गई हैं परिभाषाएं
बदल गए हैं अर्थ
सत्ता के भी
और संस्कार के भी।

वे मोदी हैं इसलिए
हत्या पर गर्व करते हैं
जो उन्हें पराजित करना चाहते हैं
वे भी कम नहीं
बार बार कुरेदते हैं उन जख्मों को
जिन्हें भर जाना चाहिए था
काफी पहले ही।

वे आधुनिक हैं क्योंकि
शादी से पहले संभोग करते हैं
तोड़ते हैं कुछ वर्जनाएं
और मर्यादा की पतली डोरी भी
क्योंकि कुछ तोड़ना ही है
उनकी मार्डनिटी का प्रतीक
चाहे टूटती हों उन्हें अब तक
छाया देनेवाली पेड़ों की
उम्मीद भरी शाखाएं
शायद नहीं समझ पा रहे हैं
वर्जना और मर्यादा का फर्क।
-मृत्युंजय कुमार

पेट

पेट ही नरक है
पेट ही स्वर्ग है

सड़क के किनारे
लालबत्ती इलाके में
छज्जे पर खड़ी होकर
लगाती आवाजें
करती अजीब इशारे
इस उम्मीद में
कि ये इशारा जगा देगा
सामने गुजर रहे लोगों में
एक भेड़िया
और भर जाएगी पेट।

वह लंबी कार से उतरती है
डकार लेती है
पिज्जा, बर्गर और पनीर के
मिले-जुले स्वाद के साथ
उसे हरियाली अच्छी लगती है
हवा भी सुहानी
दुख लगता है अर्थहीन
और जिंदगी का हर
मोड़ नजर आता है हसीन

पेट की धाह से
दूर भागते हैं देवता भी
झुलस जाती है
संवेदनाएं
मर जाती हैं इच्छाएं
जीने की
आसमान छूने की।

-मृत्युंजय कुमार