सोमवार, 10 दिसंबर 2007

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा

कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं टूट रहा
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यह इक्कीसवीं सदी है
इसलिए बदल गई हैं परिभाषाएं
बदल गए हैं अर्थ
सत्ता के भी
और संस्कार के भी।

वे मोदी हैं इसलिए
हत्या पर गर्व करते हैं
जो उन्हें पराजित करना चाहते हैं
वे भी कम नहीं
बार बार कुरेदते हैं उन जख्मों को
जिन्हें भर जाना चाहिए था
काफी पहले ही।

वे आधुनिक हैं क्योंकि
शादी से पहले संभोग करते हैं
तोड़ते हैं कुछ वर्जनाएं
और मर्यादा की पतली डोरी भी
क्योंकि कुछ तोड़ना ही है
उनकी मार्डनिटी का प्रतीक
चाहे टूटती हों उन्हें अब तक
छाया देनेवाली पेड़ों की
उम्मीद भरी शाखाएं
शायद नहीं समझ पा रहे हैं
वर्जना और मर्यादा का फर्क।
-मृत्युंजय कुमार

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